Salary Management: सैलरी के साथ इस्तेमाल करें 20/50/30 का फॉर्मूला, खर्च और सेविंग हो जाएंगे मैनेज – Navbharat Times

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20/50/30 फॉर्मूले के पहले हिस्से के तहत सबसे पहले सैलरी के 20-30 फीसदी हिस्‍से को बचत में लगाना चाहिए। ऐसा करना लॉन्ग टर्म के लिए फायदेमंद है। अगर नौकरीपेशा हैं तो रिटायरमेंट के बाद फाइनेंशियल सपोर्ट की जरूरत होगी। अगर आप मां-बाप हैं तो बच्‍चों की पढ़ाई-लिखाई, शादी आदि के लिए एक अच्छे-खासे फंड की जरूरत पड़ेगी। शादीशुदा नहीं भी हैं तो भी आगे चलकर ये खर्च सामने आएंगे ही। ऐसे में यह 20-30 फीसदी की सेविंग काम आएगी। सेविंग के लिए कई तरह के वित्तीय विकल्प मौजूद हैं जिन्हें आप आजमा सकते हैं, जैसे FD, PF, PPF, म्यूचुअल फंड आदि।

कहते हैं मुसीबत कभी बताकर नहीं आती। अगर अचानक से पैसों की जरूरत आ जाए और फंड पास न हो तो मुश्किल हो सकती है। वहीं अगर किसी से उधार नहीं मिल सका तो मुश्किल और बढ़ सकती है। इसलिए एक इमर्जेन्‍सी फंड जरूरी है। लेकिन इसके लिए आपको अलग से पैसे जमा करने की जरूरत नहीं है। सैलरी का जो 20-30 फीसदी हिस्‍सा आपने सेविंग्‍स में रखा है, उसी का एक छोटा हिस्‍सा कम से कम 5 फीसदी इमर्जेन्‍सी के लिए रखें।

फॉर्मूले के दूसरे हिस्से के तहत घर के खर्च यानी किचन का खर्च, ग्रॉसरी, बच्‍चों की फीस, पेट्रोल का खर्च, मोबाइल बिल, घर का किराया, इंटरनेट बिल आदि को शामिल किया जाता है। इन खर्चों के लिए सैलरी का 40-50 फीसदी निकालें। इसके अलावा हर महीने के बिल्‍स, जैसे क्रेडिट कार्ड बिल, बिजली का बिल, मोबाइल का बिल आदि को उनकी ड्यू डेट से पहले क्लियर कर दें। इससे होगा यह कि आप आखिरी वक्त की परेशानी और टेंशन से बचे रहेंगे और एक्‍स्‍ट्रा चार्ज भी नहीं देना पड़ेगा।

सैलरी मैनेजमेंट के फॉर्मूले के तीसरे हिस्से के तहत अगर इंश्‍योरेंस, EMI, होम लोन, पर्सनल लोन चल रहा है तो इसके लिए भी फंड का एक हिस्सा अलग रखें। यह सैलरी का 20-30% हो सकता है। ऐसा करने से आपको EMI के लिए फंड जुटाने की टेंशन से मुक्ति मिलेगी और EMI कटने के वक्त पैसा मौजूद रहेगा। EMI वक्त पर कटेगी तो आगे आप इसके डिले होने पर लगने वाले टैक्स से बच जाते हैं।

उम्र के आधार पर भी फाइनेंशियल प्‍लानिंग (Financial Planning) की जा सकती है। इसका अर्थ है कि किस उम्र पर कितने पैसों की जरूरत पड़ेगी, इसे ध्यान में रखते हुए प्‍लानिंग की जा सकती है। इससे हर उम्र की जरूरत के वक्त एक निश्चित फंड मौजूद रहेगा। जैसे शादी की उम्र पर शादी के लिए फंड, बच्चों की पढ़ाई के वक्त कितना फंड, रिटायरमेंट के बाद कितने फंड की जरूरत आदि।

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